ये हैं पहले घुमक्कड़ डा. गौरव श्रीनेत, डेंटिस्ट एंड ओरल सर्जन| बनारस से हैं और वर्तमान में लखनऊ में प्रैक्टिस करते हैं| सदाबहार मुस्कान और खुशमिजाज़ डॉक्टर साब 2014 से अभी तक बनारसी घुमक्कड़ों की सभी यात्राओं में शामिल रहे हैं| इनको प्यार से हम सभी "हैंडल विथ केयर" कहते हैं, इसलिए नहीं की ये बहुत नाजुक हैं बल्कि इसलिए क्योंकि इनके हाथ जो कुछ आता है उसके गिरने और टूटने की संभावना अधिक होती है| इस टीम का मनोबल बनाये रखने में इनका बहुत योगदान रहता है....
मिलिए दूसरे बनारसी घुमक्कड़ से, ये हैं जनाब "प्रशांत दूबे"| पेशे से बैंकर हैं और आजकल लखनऊ में पाए जाते हैं| बहुत ही उम्दा गायक हैं, किशोर दा इनके फ़ेवरेट सिंगर हैं। हमारे ग्रुप की महफिलों के ये इकलौते चिराग हैं। ये हमारे टीम के 'रेल मंत्री' भी हैं और 'उड़ान मंत्री ' भी , केंद्र में कोई भी सरकार हो इनका मंत्री पद कभी भी खतरे में नहीं पड़ता| बचपन से इनका शौक रहा है 'रेलवे डायरेक्टोरी' पढना जिससे देश के किसी भी कोने में चलने वाली ट्रेन का इनको पूरा ज्ञान रहता है| आप कभी भी आजमा के देख सकते हैं| जैसे ही हमारे ट्रिप की जगह फाइनल होती है, हमारे रेल मंत्री सक्रिय हो जाते हैं| नीचे की बर्थ इनकी फिक्स होती है, इसलिए नहीं की इनको गठिया है बल्कि इसलिए की इनको देखना होता है की कौन सी रेल लाइन कंहा से कट के कंहा जा रही है| 2017 तक इनके सामने "फ्लाइट से चलने की राय देना पूरे ट्रिप को खतरे में डाल सकता था, लेकिन अब उड्डयन मंत्रालय पर भी इनकी पकड उतनी ही उम्दा हो चली है जितनी रेल पर होती थी | भारत सरकार इनको "रेल रत्न" के साथ 'उड़ान रत्न' भी देने का विचार बना रही है|
अब वक्त है एक और नायब इन्सान से तार्रुफ़ करवाने का, मिलिए जनाब ''राजेश सिंह" से | आप मेकैनिकल इंजिनियर हैं| मूलतः चंदौली के रहने वाले हैं और आज कल बोधगया में एक रेलवे स्लीपर बनाने वाले प्लांट में G.M और प्लांट हेड हैं| इनको हम लोग प्यार से "राज्वेन्द्र बाहुबली" बुलाते हैं क्योंकि इनको ये लगता है की दुनिया में कोई ऐसा काम नहीं है जो हो नहीं सकता| Negotiation Skills में इनको महारत हासिल है चाहे वो इनके प्लांट के यूनियन लीडर्स से हो रही हो या फिर किसी होटल के मैनेजर से या फिर समुद्र के किनारे फोटो लेने वाले फोटोग्राफेर्स से| एक बार डेस्टिनेशन पर पंहुच जाने के बाद मोल-भाव करने का चार्ज इनके पास चला जाता है| हम लोगों के ट्रिप में होने वाले खर्च में हर बार कम से कम 10 से 20 प्रतिशत तक की बचत इनकी इसी क्षमता से होती है| शरीर से ये जवान हो चुके हैं पर मन इनका 10 साल के बच्चे जैसा है| जैसे बच्चे वो ही करते हैं जो उनको मना करिए, ठीक उसी तरह जी.एम्. साहब भी हैं दीवाल दिखी तो उसपर चढ़ना है, समुद्र में अधिक अंदर जाने के लिए मना करिए तो और गहरे पानी में जाकर ये वो सब करतब दिखाने लगते हैं जो इन्होने बलुआ घाट पर गंगा माँ की गोद में सीखा है| एक लाइन में अगर इनकी शख्सियत को बयां करना होगा तो इतना ही कहना काफी होगा की "ये शख्स दोस्तों के लिए जान दे भी सकता है और जान ले भी सकता है"| जियो बलुआ नरेश ....we love you
बनारसी घुमक्कड़ ग्रुप के अगले रत्न हैं जनाब "विकास श्रीवास्तव" , इनको जिस नाम से लोग अधिक जानते हैं वो है "चंदू" | रत्न की जगह इनको जौहरी कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी क्योंकि ये इन्सान को पहली मुलाकात में ही परख लेते हैं की वो सच्चा है की नहीं | इनकी जन्मभूमि और कर्मभूमि दोनों ही बनारस है| ये उत्तर प्रदेश सरकार के लोक निर्माण विभाग में कार्यरत हैं| इनकी बनारसी जबां सुन के पक्के महाल वाले भी पूछ बैठते हैं " अरे मालिक! ई बतावा तोहार घरवा कौने गल्ली में हौ?"
इनको जानने वाले मेरी एक बात से सहमत होंगे की ऊपर वाले ने इनको एक खास खूबी प्रदान की है, "सभी को एक सूत्र में बांध के रखने की " घर -परिवार हो, दोस्त और उनके परिवार वाले हों या फिर हमारा ये अदना सा ग्रुप ही क्यों न हो ये किसी को बिखरता हुआ नहीं देख सकते| सभी को एक सूत्र में बांधे रखने के लिए ये जो बन पड़ेगा वो कर सकते हैं| यही कारण है की ये हर दिल अज़ीज़ हैं| हमारे ग्रुप में भी जब कोई मतभेद होता है तो आखिरी फैसला इन्ही का होता है और हम सभी को सहर्ष स्वीकार होता है| अनेक गुणों में इनका एक और गुण है, स्टोरी टेलिंग - किसी भी वक्त किसी भी परिस्थिति के लिए इनके पास कोई न कोई कहानी जरुर होती है| इनके तजुर्बे और संयम को देखते हुए पूछने का मन करता है "तू कब कर पैदा भएल हउआ मालिक " | इनसे सच्चे दिल वाला तो हमने नहीं देखा जो 24 घंटे लोगों की मदद करने के लिए तैयार रहे| आप सभी को पता होगा की किसी को ब्लड डोनेट करने के बाद अगले कुछ महीने आप किसी को ब्लड डोनेट नहीं कर सकते, ये उनमें से हैं जो जरुरत पड़ने पे महीने में तीन बार भी ब्लड डोनेट करने को तैयार रहते हैं| ये हमारे ग्रुप के बड़े भईया हैं....चपले रहा गुरु हम्हने तोहरे साथ हई
इस सदाबहार मुस्कान वाले चेहरे के मालिक हैं डा. अविनाश सिंह | आप डेंटिस्ट हैं और आर्थोडेनटीइंस्ट्री में विशेषज्ञ हैं| आम भाषा में समझने के लिए वो डेंटिस्ट जो टेढ़े-मेढ़े दांतों को करीने से सजा के चेहरे की खूबसूरती में चार-चाँद लगा देता है| बनारस से हैं और वन्ही प्रैक्टिस भी करते हैं| इनकी डेंटिस्टरी से सम्बंधित और जानकारी के लिए आप हमें इनबॉक्स कर सकते हैं| आप घुमने के बहुत बड़े शौक़ीन हैं और हमारे ग्रुप में घुमक्कड़ी की इस बीमारी की महामारी इन्होने ही फैलाई है|
आप का ग्रुप में प्रमुख रोल होता है नयी नयी जगहों के बारे में पता लगाते रहना और हम सभी के सामने हमारे वार्षिक भ्रमण के लिए तीन-चार आप्शन देना|
मोबाइल कंपनीज ने रोमिंग की खोज बहुत देर से की, सही मायने में डॉ. साब ही रोमिंग के जनक हैं| स्कूल - कालेज की ज़माने से ही आप जंहा कंही भी घूमने जाते थे वंहा लोकल नेटवर्क का जुगाड़ अपनी जहरीली मुस्कान से कर लेते थे| इनका ध्येय होता है की साथियों के सुख सुविधा और खाने - पीने में कोई रुकावट नहीं हो| ब्रेकफास्ट, लंच और डिनर में क्या खाना है ये इन्ही के द्वारा तय होता है और इनकी पसंद इतनी उम्दा होती है कि कोई ना नहीं बोल पाता| डा. साब नाराज भी बहुत जल्दी होते हैं और इनको मनाना थोडा टेढ़ा काम होता है, इसलिए इनको खुश रखना ही हम सभी की जिम्मेदारी होती है| ये हमारे ग्रुप के ड्राइविंग फोर्स हैं , साल भर अगले ट्रिप की तैयारी करवाना जैसे समय से टिकट बुक होना, समय से होटल की बुकिंग , सभी को याद् दिलाना कि " गुरु ! छाता जरुर रख लिहा बहुत बारिश होला उन्हा " आदि इन्ही की जिम्मेदारी होती है| डॉ. साब यारों के यार हैं ....आजकल इनके साथ घुमने जाने में एक ही समस्या होती है, ये हर दुसरे चेहरे को देख कर ये बताने लगते हैं कि उसके कितने दांत निकाल के और कितने समय तक तार बांध के ये उसको और खूबसूरत बना सकते हैं....आप में से किसी को इनके बारे में और भी कुछ पता हो तो हम सभी को भी बताएं
परिचय की कड़ी में जिनका नाम आखिरी में आ रहा है, उनके नाम की लम्बाई इतनी है कि लिखने में उँगलियों में दर्द हो जाये| मिलिए जनाब "बृजेश कुमार गोविन्द राव" से, इनके नाम को लेकर स्कूल में लड़ाइयाँ हो जाती थीं क्योंकि इनको स्कूल में कोई इनके असली नाम से नहीं जानता था बल्कि घर में जो पुकार के लिए नाम रखा गया था "टोनी", उसी से जानता था| एक बार, एक नए एडमिशन लिए लड़के ने इनके पुराने साथी को बताया की "अबे उसका नाम तो कुछ बृजेश करके बहुत लम्बा सा है" तो पुराने साथी ने उसको सूत दिया की "साले ! हम उसके साथ कक्षा 2 से पढ़ रहे हैं, उसका नाम टोनी है..." | आप भी जन्म से बनारसी हैं और आजकल दिल्ली में पाए जाते हैं|
नाम की तरह इनके काम को लेकर भी लोगों में विभिन्न प्रकार की भ्रांतियाँ व्याप्त है| दोस्तों को सिर्फ इतने से मतलब है कि पहले यूनिसेफ में काम करता था अब उसी की जैसी किसी और संस्था में काम करता है, करता क्या है ये मत पूछिये| इनसे मिलने पर गलती से इनके काम के बारे में मत पूछ लीजियेगा, क्योंकि ये किसी को बिना समझाये छोड़ते नहीं हैं और इनका काम आसानी से समझ आने वाला नहीं हैं| इनको जानने वाले कहते हैं की ये बहुत ही भावुक इन्सान हैं और इसके चलते कई बार अपना नुकसान करवा बैठते हैं|
इनको बुढौती में नई - नई चीजें सीखने का शौक चढ़ता रहता है| उसी क्रम में इन्होने कोई दो -तीन साल पहले "फोटोग्राफी" सीखनी शुरू की और आजकल अपना ये शौक ग्रुप के टूर के दौरान भी पूरा करते रहते हैं| इनको हमेशा गाड़ी की अगली सीट पर बिठाया जाता है, क्या पता डायरेक्टर साब को कब, कंहा, कौन सा लोकेशन पसंद आ जाये| गलती से अगर ड्राईवर ने रोकने में आना-कानी की तो उसकी खैर नहीं| इनको गुस्सा बहुत जल्दी आता है पर सभी को पता है कि ये अपने लिए कम सबकी भलाई के लिए ज्यादा गुस्सा करते हैं, इसलिए फोटोशूट के समय जिसको भाई ने जितने समय के लिए जंहा खड़ा कर दिया, वो वंहा से हिल नहीं सकता| रात में कितने बजे भी सोंये अगर घुमने गए हैं तो सुबह 4:30 बजे से अपना कैमरा लिए आपको तैयार नजर आते हैं| पिछले कुछ वर्षो से अब इन्हें खाना बनाने का शौक चढ़ा है और अब ये उसमें पारंगत होने की कोशिश में हैं| इनके इस ने शौक की वजह से अविनाश के ऊपर दबाव बढ़ गया है जो हर टूर में कम से कम दो रात ऐसी जगह रुकना चाहते हैं जन्हा किचेन और खाना पकाने की सुविधा मौजूद हो और भाई के हाथ के लजीज पकवान खाने को मिलें| अपनी कभी न खत्म वाली उर्जा का श्रेय ये दोस्तों के साथ को देते हैं|