बनारसी घुमक्कड़ के प्रशंसकों और चाहने वालों के लिए हम सभी की एक और यात्रा का वृतांत प्रस्तुत है। दरअसल, उस समय तक Banarasi घुमक्कड़ की सोच भी नहीं जन्मी थी लेकिन हाँ इसी यात्रा के दौरान इसका बीज बो दिया गया था। इस यात्रा से लौटने के बाद एक व्हाट्स ग्रुप बना जिसे नाम दिया गया "बख्खाली गैंग" और उस गैंग में जो सदस्य स्थाई बने रहे वो आज बनारसी घुमक्कड़ के नगीने हैं । इस यात्रा में ही पहली बार एक दोस्त को लगा कि क्यों न एक जैसी टी-शर्ट लेके चला जाये और किसी एक दिन फ़ोटो शूट किया जाये जिससे भविष्य में भी इन यादोँ को दुबारा जिया जा सके। बख्खाली यात्रा की फ़ोटोज में शायद आपको प्रोफेशनल टच न दिखाई दे क्योंकि तब तक हमारे ऑफिसियल फोटोग्राफर साब ने सीरियसली फोटोग्राफी शुरू नही की थी और न ही उनके पास प्रोफेशनल कैमरा था, पर एक बात जरूर थी की पॉइंट एंड शूट कैमरा लेकर डायरेक्शन पूरा उन्ही ने दिया था और फोटोशूट भी उन्ही ने किया था। इस यात्रा में हम लोगों के एक और साथी शामिल थे प्रदीप भाई जिन्होंने वंहा से लौटने के बाद कभी फिर इस तरह की यात्रा में शामिल होने की इच्छा नहीं जताई और इस वज़ह से वो हमारे ग्रुप के स्थायी सदस्य नहीं बन पाए, कारण था कि भाई को पानी से बहुत डर लगता है।
बख्खाली गांव की खोज एक अंग्रेज अधिकारी एंड्रू फ्रेजर ने लगभग 1903 से 1908 के बीच में कभी की थी। ऐसे तो पश्चिम बंगाल में घूमने के लिए बहुत सारे समुद्र तट हैं पर अगर आप एक शांत और कोलाहल से दूर के तट पर सुकून से अपनी छुट्टियां बिताना चाहते हैं तो बख्खाली से बेहतर जगह नही हो सकती। बख्खाली, दक्षिणी 24 परगना जिले के नामखाना ब्लॉक् में पड़ता है। अगर नक़्शे पर खोजने की कोशिश करेंगे तो आप को ये बंगाल के नीचे समुद्र में लटकता हुआ दिखाई देगा। कोलकाता से बख्खाली की दूरी लगभग 130 किलोमीटर है। बख्खाली तक जाने के लिए आप रोड या ट्रेन दोनों ही साधन उपयोग में ला सकते हैं। अगर आप मार्च 2019 से पहले यँहा का प्लान बनाते तो ट्रेन या टैक्सी दोनों ही सूरत में आपका सामना एक मजेदार अनुभव से होता वो है नामखाना में Hatania-Doania नदी को नाव से पार करना । मार्च 2019 में इस नदी पर पुल बन गया है जिसपर छोटे वाहन आ जा सकते हैं वरना उसके पहले गाड़ियों को भी नाव पर चढ़ा कर फेरी के जरिये आरपार करवाया जाता था।
हम लोगों ने अपने सफर को और रोमांचक बनाने के लिए लोकल ट्रेन से नामखाना तक जाने का निर्णय लिया था, मछली के टोकरों से भरी लोकल ट्रेन में सुबह 5 बजे सियालदह स्टेशन से चढ़कर जाने को रोमांचक ही बोला जाना चाहिए। सबसे मजेदार बात की हमारे कई साथियों को सुबह पेट साफ न हो पाने की बीमारी है उनका प्रेशर कब बनेगा ये ऊपरवाला भी नही जानता और इस रूट पर चलने वाली लोकल में शौचालय की सुविधा नदारद थी। भाई लोग पूरी रात इस टेंसन में सो भी नहीं पाए और सबसे बुरा तो ये की बख्खाली पँहुचने तक निपट भी नही पाए । कृपया याद रखें उस समय तक यँहा कोई एक्सप्रेस ट्रैन नही जाती थी, अभी अगर जाने लगी हो तो पता नहीं।
नामखाना पँहुचने के बाद जो सवारी हमारा इंतेजार कर रही थी उसको आप तस्वीर में देख सकते हैं, हमे लग रहा था कि छुट्टी मनाने जा रहे हैं या काला पानी की सज़ा काटने। फिर हम सब पंहुचे उस नदी तक जिसके बारे में इतना सुना और पढ़ा था। इस पर पुल न बनने का कारण इसका बांग्लादेश से बड़े बड़े नाव में आने वाली हिलसा मछली से जुड़ा हुआ था ऐसा कुछ स्थानीय लोगों ने बताया था। बंगाल में घूमना कितना सस्ता है ये एहसास हम सब को तब हुआ जब प्रति व्यक्ति एक रुपया का किराया देकर हम लोगों ने पूरी नाव का किराया कुल 7 रुपया अदा किया गया, पता चला कि सरकार द्वारा तय किराया ही इतना है। नदी के दूसरी तरफ से बख्खाली पँहुचने के लिए हमने टाटा मैजिक बुक किया जिसने लगभग 40 मिनट में हमे वंहा पंहुचा दिया जंहा बंगाल टूरिज़म के कमरे हमारा इंतेज़ार तो कर रहे थे पर बीच में कुछ बाधाएं भी इंतेजार कर रही थीं। आगे की दास्ताँ अगली कड़ी में। सजे सजाए घुमक्कड़ों को ऐसे अस्त व्यस्त अवस्था में देख कर आपको समझ आ जायेगा कि हमारी लोकल ट्रेन की यात्रा कितनी रोमांचक रही होगी, शायद चेहरे देखकर आप यह भी अंदाजा लगा पाएं की किसे होटल के कमरे में पँहुचने की जल्दी थी और किसे उसके टॉयलेट पँहुचने की|
बख्खाली में हमारी बुकिंग वंहा के टूरिज्म लॉज में थी जिसका संचालन वेस्ट बंगाल टूरिज्म डेवलपमेंट कारपोरेशन द्वारा होता है| लॉज से आप कंफ्यूज मत होइएगा, यह एक बहुत ही खुबसूरत रिसोर्ट है | इसकी ऑनलाइन बुकिंग भी करवाई जा सकती है | यंहा एक ए.सी. रूम लगभग 1900 + टैक्स में बुक करवाया जा सकता है, बुकिंग मिलना मुश्किल हो सकता है क्योंकि इस रेट वाले सिर्फ 8 ही कमरे हैं, बाकी कमरों के लिए अधिक पैसा खर्च करना पड़ेगा| हमने जैसा हम हर बार करते हैं, बुकिंग 4 महिना पहले ही करवा ली थी | बस एक ही बाधा का सामना करना पड़ा, हमारी बुकिंग १२ बजे से थी और हम सब वंहा 9 तक पंहुच गए थे | इतनी बार बंगाल की यात्रा करने के बाद एक बात समझ आ चुकी है की अपने कुछ बंगाली भाई लोग कुछ और करे या न करें नियम का पालन करवाने (गौर करियेगा करवाने, करने नहीं) में बहुत ही माहिर होते हैं, तो हमे जो यंहा के मैनेजर साब मिले उन्होंने ने भी हमें पुरे नियम कानून सुनाये| फिर उन्होंने कहा की सामान रख के आप सब तब तक बीच पर घूम आइये तब तक कमरे तैयार हो जायेंगे, हम सभी को भी बात लोजिकल लगी पर समस्या तो आप लोगों को याद होगी हमारे कुछ साथी तो अपना प्रेशर सुबह से दबाये हुए थे उनको लगा की उन्हें सजाये मौत की सजा सुना दी गयी हो | खैर उन्होंने होटल के सार्वजनिक शौचालय का प्रयोग किया| फिर हम सब चले समुद्र तट की और इस होटल की खाशियत यह भी है की यह तट के बिलकुल पास में हैं रात में आपको समुद्र की आवाज रूम में सुनाई देगी| समुद्र देख कर सभी खुश हो गए वंहा तब बहुत दुकाने नहीं थीं और लोग भी बहुत कम थे | हमने चाय पी हल्का नाश्ता किया पर सबका कहना था की नहायेंगे थोड़ी देर बाद जब रूम में चेक इन हो जायेगा और थोडा फ्रेश महसूस करेंगे| 11 बजे तक हम वापस होटल आ गए फिर शुरू हुआ हमारे ग्रुप के नेगोसिएटर राजेश बाबु और वंहा के मैनेजर के बीच का संग्राम जो अगले चार दिन बद्श्तुर जारी रहा | मैनेजर 11 बजे भी रूम खोलने के लिए तैयार नहीं था उसका कहना था की वो १२ बजे ही रूम खुलवाएगा | उसका तर्क था की आप लोग जो एक घंटा ए.सी. चलाएंगे उसका बिजली का बिल उठेगा इसलिए वो एक घंटे बाद ही रूम देगा | हम लोगों ने कहा चेक आउट वाले दिन हम सुबह 6 बजे निकल जायेंगे तो उस दिन 6 घंटे में एडजस्ट भी तो होगा पर वो सुनने को तैयार नहीं था | फिर जब हम सभी में जब कुछ बनारसी अंदाज अपनाया और उसके अधिकारी का नंबर माँगा तब जाकर उसने हमे रूम देना शुरू किया | इस खुन्नस में राजेश बाबू ने सभी बुक कमरों के ए.सी. को पुरे चार दिन एक मिनट के लिए भी बंद नहीं होने दिया, जब हम बाहर जाते थे तब भी कंघी घुसा के बिजली चालू रखी जाती थी, भाई का गुस्सा इतना ज्यादा था की मैनेजर चार दिन सामने नहीं आया और न ही हम लोगों में से किसी की हिम्मत हुई की ए.सी. बंद कर दें| इस होटल के रेस्टुरेंट का खाना ठीक-ठाक की श्रेणी में आएगा और हमारे लिए ठीकठाक का मतलब, "कैसो खा लिहल जाई" की श्रेणी में आता है| हमारे पंडित जी अरे वही बैंक वाले दुबे जी ने एक दिन पनीर की सब्जी बनवाई (आप भी सोच रहे होंगे की वो तो सिर्फ मुर्गा खाते हैं तो पनीर क्यों? वो भाई का पेट उस दिन थोडा ख़राब था इसलिए) तो खाने के बाद पूरा दिन उसके हाथ को देखकर लग रहा था की दुबे जी दोबारा शादी वाला हल्दी लगवा लिए हैं| खाने के लिए आप बाहर की खाए तो अच्छा होगा ऐसा हमारी सलाह होगी| उस दिन दोपहर में जब हम सभी समद्र तट पर नहाने पंहुचे तो एक और झटका हमारा इन्तेज़ार कर रहा था |